युवाओं में बढ़ती अशांति एवं इसके अंतर्निहित कारण

पाठ्यक्रम: GS3/अर्थव्यवस्था

संदर्भ

  • विश्व के अनेक देशों, जिनमें फ्रांस, स्पेन, अल्बानिया और यहाँ तक कि भारत भी शामिल हैं, में युवाओं द्वारा विरोध-प्रदर्शन एवं संगठित सक्रियता देखने को मिल रही है।

परिचय

  • फ्रांस गंभीर आर्थिक समस्याओं का सामना कर रहा है। इनमें उच्च बेरोजगारी, निम्न आर्थिक विकास दर, जीवन-यापन की बढ़ती लागत, वास्तविक मजदूरी में गिरावट तथा सार्वजनिक व्यय में भारी कटौती शामिल हैं।
  • इन सभी समस्याओं के केंद्र में नवउदारवादी आर्थिक मॉडल है, जिसने सामान्य रूप से सार्वजनिक व्यय और विशेष रूप से कल्याणकारी योजनाओं पर होने वाले व्यय में आक्रामक रूप से कटौती को बढ़ावा दिया है।

युवा बेरोजगारी के कारण

  • धीमी आर्थिक वृद्धि: धीमी आर्थिक वृद्धि से व्यवसायों के विस्तार की संभावनाएँ सीमित हो जाती हैं और नए रोजगारों का सृजन कम होता है।
    • कई विकसित देशों में युवा जनसंख्या में कमी आ रही रही है, फिर भी वहाँ युवा बेरोजगारी की दर उच्च बनी हुई है।
    • यह दर्शाता है कि समस्या केवल श्रम की अतिरिक्त आपूर्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि श्रम की अपर्याप्त माँग भी इसका एक प्रमुख कारण है।
  • निवेश में गिरावट: गैर-पारंपरिक आर्थिक दृष्टिकोणों के अनुसार, रोजगार का स्तर निवेश तथा वस्तुओं और सेवाओं की समग्र माँग पर अत्यंत सीमा तक निर्भर करता है। जब व्यवसाय निवेश कम कर देते हैं, तो आर्थिक गतिविधियाँ धीमी हो जाती हैं, जिससे श्रमिकों की माँग घटती है।
  • नवउदारवादी आर्थिक नीतियाँ: नवउदारवाद बाजार-आधारित आर्थिक विकास पर बल देता है। इसका तात्पर्य निजीकरण और राजकोषीय संयम सहित सरकारी हस्तक्षेप में कमी से है।
    • सार्वजनिक व्यय में कमी, श्रमिक संघों की कमजोर होती स्थिति तथा कल्याणकारी सहायता में कटौती ने आर्थिक असुरक्षा को बढ़ाया है और श्रमिकों की सौदेबाजी की शक्ति को कमजोर किया है।
  • बढ़ती असमानता और अपर्याप्त उपभोग: जब मजदूरी में धीमी वृद्धि होती है अथवा राष्ट्रीय आय में श्रमिकों की हिस्सेदारी घटती है, तो परिवारों का उपभोग भी कमजोर हो जाता है।
    • कम उपभोग व्यवसायों को अतिरिक्त उत्पादन में निवेश करने से हतोत्साहित कर सकता है, जिससे धीमी आर्थिक वृद्धि और बेरोजगारी का दुष्चक्र उत्पन्न होता है।
  • प्रौद्योगिकी के कारण रोजगार का विस्थापन: स्वचालन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) ने श्रमिकों द्वारा किए जाने वाले कुछ कार्यों का स्थान ले लिया है, जिससे कुछ प्रकार के रोजगारों की माँग घट सकती है।
    • यदि नए रोजगारों का सृजन तकनीकी परिवर्तन की गति के अनुरूप नहीं होता है, तो श्रम बाजार में प्रवेश करने वाले युवाओं को अधिक प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ता है।
  • शिक्षा की बढ़ती लागत: अनेक देशों में शिक्षा निरंतर महँगी होती जा रही है, जबकि केवल डिग्री प्राप्त कर लेना सुरक्षित अथवा पर्याप्त वेतन वाले रोजगार की गारंटी नहीं देता है।
    • इससे युवाओं पर वित्तीय दबाव और निराशा बढ़ती है, विशेषकर उन युवाओं में जिन्हें अपनी शैक्षणिक योग्यता के अनुरूप रोजगार प्राप्त करने में कठिनाई होती है।

आगे की राह

  • रोजगार-सघन आर्थिक विकास को बढ़ावा देना: रोजगार के अवसरों का विस्तार करने के लिए श्रम-प्रधान क्षेत्रों को प्रोत्साहित करने, लघु एवं मध्यम उद्यमों को सहायता प्रदान करने तथा अवसंरचना और सार्वजनिक सेवाओं में निवेश बढ़ाने की आवश्यकता है।
  • शिक्षा एवं कौशल विकास में सुधार: किफायती शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण तथा शैक्षणिक संस्थानों और नियोक्ताओं के बीच बेहतर समन्वय से युवाओं को उपयुक्त रोजगार प्राप्त करने में सहायता मिल सकती है।
  • प्रौद्योगिकीगत परिवर्तन का प्रबंधन: स्वचालन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विघटनकारी प्रभावों से निपटने के लिए सरकारों एवं व्यवसायों को पुनः कौशल विकास, श्रमिकों के संरक्षण तथा नए रोजगार अवसरों के सृजन में निवेश करना चाहिए।
  • श्रम बाजार संस्थानों को सुदृढ़ करना: प्रभावी श्रम संरक्षण, सामूहिक सौदेबाजी तथा उचित मजदूरी से श्रमिकों की सौदेबाजी की शक्ति बढ़ सकती है और साथ ही संधारणीय आर्थिक विकास को भी समर्थन मिल सकता है।

निष्कर्ष

  • युवा बेरोजगारी केवल व्यक्तिगत कौशल अथवा रोजगार-योग्यता की समस्या नहीं है, बल्कि यह निवेश, समग्र माँग, मजदूरी के वितरण तथा आर्थिक विकास की संरचना से भी जुड़ी हुई है।
  • उत्पादक निवेश, प्रभावी सार्वजनिक नीतियों, सामाजिक सुरक्षा तथा गरिमापूर्ण कार्य के अवसरों को सम्मिलित करने वाले संतुलित दृष्टिकोण को अपनाने की आवश्यकता है।
  • युवा बेरोजगारी को कम करना न केवल आर्थिक स्थिरता, बल्कि सामाजिक समावेशन और अंतर-पीढ़ीगत समानता के लिए भी आवश्यक है।

स्रोत: TH

 

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